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नवंबर, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Suvichar - सुविचार - पाप पुण्य का भेद

पुण्य किसी को दगा देता नहीं। पाप किसी का सगा होता नहीं। #jainismSansar #jain #jainism #suvichar http://jainismSansar.blogspot.com/

My prayer - मेरी प्रार्थना

⁠⁠⁠   अतिसुन्दर प्रार्थना               सुकून उतना ही देना,    प्रभु जितने से जिंदगी चल जाए,       औकात बस इतनी देना, कि,          औरों  का भला हो जाए,      रिश्तो में गहराई इतनी हो, कि,            प्यार से निभ जाए,      आँखों में शर्म इतनी देना, कि,         बुजुर्गों का मान रख पायें,       साँसे पिंजर में इतनी हों, कि,          बस नेक काम कर जाएँ,            बाकी उम्र ले लेना, कि,        औरों पर बोझ न बन जाएँ My Prayer http://jainismSansar.blogspot.com/ #jainismSansar #jainismlearner #jain #jainism #suvichar #thoughtoftheday #inspirationalquotes #prayer #happythoughts   

Gyan panchami ki aaradhana - ज्ञान पंचमी की आराधना

✍ज्ञान से बडी कोई शक्ति नहीं, ✍ज्ञान से बडा कोई बल नही, ✍ज्ञान से बड़ा कोई धन नही, ✍ज्ञान से बड़ी कोई पूजा नहीं, ✍ज्ञान से बड़ी कोई साधना नहीं, ✍ज्ञान से बड़ी कोई आराधना नहीं,  ज्ञान पंचमी की आराधना..  ज्ञान की आराधना का दिन है। तीर्थंकर भगवान् महावीर ने अपनी देशना में कहा है... स्थाई सुख के साधन है...  ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप l ◾सुख में बाधा डालने वाले है... क्रोध, मान, माया और लोभ l ❇ ये पाँच ज्ञान की आराधना में बाधक कारण है, अतः  अह पंचहिं ठाणेहिं, जेहिं सिक्खा न लब्भइ । थंभा कोहा पमाएणं, रोगेणालस्सए णय प ।। अर्थात् : अहंकार, क्रोध, प्रमाद, रोग और आलस्य... ज्ञान-प्राप्ति में बाधक कारण है l ***********************************    ज्ञानपंचमी दिवस की क्रिया - आराधना... ***********************************  जिनालय में जाकर बच्चों द्वारा ज्ञान के साधन : पुस्तक काँपी, पैन, पैसिल आदि चढवाकर ज्ञान की वासक्षेप से पुजा जरूर कराये l आज से ज्ञान पंचमी की आराधना तप शुरू करने का विधान है, जिसकी अवधि 5 वर्ष 5 माह होती है....  ज

ज्ञान पंचमी और उसका महत्त्व

ज्ञान पंचमी और उसका महत्व एवं उससे जुडी प्रचलित कथा… भाव एवं क्रिया (कार्य) के द्वारा कर्म-बंधन का अनुपम उदारहण… भरतखंड में अजितसेन राजा का वरदत्त नामक एक पुत्र था, वह राजा का अत्यंत दुलारा था। उसका बोध (ज्ञान) नहीं बढ़ पाया, अच्छे कलाविदों एवं ज्ञानियों आदि के पास रखने पर वह ज्ञानवान नहीं बन सका। उसकी यह स्थिति देखकर राजा बहुत खिन्न रहता था, सोचता था की मुर्ख रहने पर यह प्रजा का पालन किस प्रकार करेगा…? राजा अजितसेन ने सोचा -” मैंने पुत्र उत्पन्न करके उसके जीवन-निर्माण का उत्तरदायित्व अपने सिर पर लिया है, अगर इस दायित्व को मैं ना निभा सका तो पाप का भागी होऊँगा। इस प्रकार सोचकर राजा ने पुरस्कार देने की घोषणा करवाई की जो कोई विद्वान उसके राजकुमार को शिक्षित कर देगा उसे यथेष्ट पुरस्कार दिया जाएगा, मगर कोई भी विद्वान् ऐसा नहीं मिला जो उस राजकुमार को कुछ सिखा सकता, राजकुमार कुछ भी ना सीख सका…उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर ही रहा। * शिक्षा के अभाव के साथ उसका शारीरिक स्वास्थ भी खतरे में पड़ गया, उसे कोढ़ का रोग लग गया। लोग उसे घृणा की दृष्टि से देखने लगे…सैंकड़ों दवाएँ

ज्ञान पंचमी और उसका महत्त्व

ज्ञान पंचमी और उसका महत्व एवं उससे जुडी प्रचलित कथा… भाव एवं क्रिया (कार्य) के द्वारा कर्म-बंधन का अनुपम उदारहण… भरतखंड में अजितसेन राजा का वरदत्त नामक एक पुत्र था, वह राजा का अत्यंत दुलारा था। उसका बोध (ज्ञान) नहीं बढ़ पाया, अच्छे कलाविदों एवं ज्ञानियों आदि के पास रखने पर वह ज्ञानवान नहीं बन सका। उसकी यह स्थिति देखकर राजा बहुत खिन्न रहता था, सोचता था की मुर्ख रहने पर यह प्रजा का पालन किस प्रकार करेगा…? राजा अजितसेन ने सोचा -” मैंने पुत्र उत्पन्न करके उसके जीवन-निर्माण का उत्तरदायित्व अपने सिर पर लिया है, अगर इस दायित्व को मैं ना निभा सका तो पाप का भागी होऊँगा। इस प्रकार सोचकर राजा ने पुरस्कार देने की घोषणा करवाई की जो कोई विद्वान उसके राजकुमार को शिक्षित कर देगा उसे यथेष्ट पुरस्कार दिया जाएगा, मगर कोई भी विद्वान् ऐसा नहीं मिला जो उस राजकुमार को कुछ सिखा सकता, राजकुमार कुछ भी ना सीख सका…उसके लिए काला अक्षर भैंस बराबर ही रहा। * शिक्षा के अभाव के साथ उसका शारीरिक स्वास्थ भी खतरे में पड़ गया, उसे कोढ़ का रोग लग गया। लोग उसे घृणा की दृष्टि से देखने लगे…सैंकड़ों दवाएँ चल